ट्यूशन वाली दीदी से यारी और चुदाई: भाग 3
हेलो दोस्तों, क्या हाल है? उम्मीद करता हूं कि सब मजे में होंगे, अपनी-अपनी जिंदगी की आग बुझाते हुए।
मैं हूं वो ही लड़का, जिसकी कहानी तुम पिछले दो भागों में पढ़ चुके हो। पहले भाग में बताया था कैसे नेहा दीदी से ट्यूशन के दौरान दोस्ती हुई और वो दोस्ती बिस्तर तक पहुंच गई।
दूसरे में घर पर दिनभर की वो गर्मागर्म मुलाकातें, जहां हर कोना हमारी चुदाई का गवाह बना। अब इस तीसरे और आखिरी भाग में सुनाओगे तो यकीन नहीं करोगे,
लेकिन सच्ची घटना है – कैसे नेहा दीदी ने एक बस ट्रिप का प्लान बनाया और पूरी रात बस में ही मुझे चोदने का मजा दिया।
वो रात आज भी मेरी यादों में ताजा है, जैसे कल की बात हो। चलो, शुरू से बताता हूं, बिना कुछ छिपाए, क्योंकि ये कहानी तुम्हारे लिए है, मेरे जैसे सोचने वालों के लिए।
बात उस हफ्ते की है जब ट्यूशन क्लास में नेहा दीदी कुछ ज्यादा ही चुप-चुप लग रही थीं। क्लास खत्म हुई, बाकी बच्चे घर चले गए, और मैं अपना बैग पैक कर रहा था।
दीदी मेरे पास आईं, उनकी आंखों में वो शरारत वाली चमक थी जो मैं अच्छे से पहचानता हूं। "सुन रे, इस वीकेंड फ्री है क्या?" उन्होंने धीरे से पूछा, जैसे कोई राज की बात हो।
मैंने मुस्कुराकर कहा, "हां दीदी, क्यों? कोई प्लान?" वो हंस पड़ीं, उनकी हंसी में वो कामुकता थी जो मेरे लंड को जगाने के लिए काफी थी।
"हां, एक छोटी-सी ट्रिप। तू और मैं, बस से।
रातभर का सफर, किसी हिल स्टेशन की तरफ। क्या कहता है?" मैं तो जैसे आसमान में उड़ने लगा।
बस? रातभर?
अकेले? मैं समझ गया कि ये ट्रिप पढ़ाई या घूमने के लिए नहीं, बल्कि हमारी उस आग को और भड़काने के लिए है।
"बिलकुल, दीदी। कब निकलना है?" मैंने उत्साह से पूछा।
उन्होंने बताया कि शुक्रवार शाम को, एक प्राइवेट स्लीपर बस बुक की है, जहां केबिन अलग-अलग होते हैं, परदे लगे, और कोई झांक नहीं सकता। मैं घर जाकर पैकिंग करने लगा, मन में हजारों ख्याल – क्या होगा बस में?
क्या कोई देख लेगा? लेकिन वो रोमांच ही तो मजा था।
शुक्रवार शाम आई। मैं पिकअप पॉइंट पर पहुंचा, नेहा दीदी पहले से वहां थीं।
वो एक ब्लैक जींस और व्हाइट क्रॉप टॉप में थीं, जो उनके कर्व्स को हाइलाइट कर रहा था। उनके बूब्स की शेप साफ दिख रही थी, लगता था ब्रा नहीं पहनी।
हमने हल्का-सा हग किया, और बस आ गई। ये एक लग्जरी स्लीपर बस थी,
ऊपर की बर्थ हमारी थी – डबल बेड जैसी, सॉफ्ट गद्दा, और साइड में परदा।
हम चढ़े, अपना सामान रखा, और बस चल पड़ी। शहर की लाइट्स पीछे छूट रही थीं, हाईवे पर बस स्पीड पकड़ रही थी।
दीदी ने परदा बंद किया, केबिन में सिर्फ हम दोनों। बाहर शाम का अंधेरा घिर रहा था, बस की एसी की ठंडी हवा चल रही थी।
दीदी मेरे करीब सरक आईं, उनका हाथ मेरी जांघ पर रखा। "अब तो अकेले हैं, शुरू करें?" उनकी आवाज में वो भूख थी।
मैंने हां में सिर हिलाया, और वो मेरे होंठों पर टूट पड़ीं। किस इतना गहरा था कि जीभें आपस में लड़ रही थीं, जैसे सालों की प्यास हो।
मैंने उनका टॉप ऊपर किया, और सही था – ब्रा नहीं। उनके 36 साइज के गोरे बूब्स मेरे हाथों में थे, निपल्स हार्ड हो चुके थे।
मैं एक को मुंह में लिया, चूसने लगा, जीभ से घुमाता हुआ। दीदी की सांस तेज हो गई, "आह...
ऐसे ही... मेरे राजा...
चूस ले अपनी दीदी की चुचियां... वो तेरे लिए ही तो हैं।" बस की हल्की वाइब्रेशन से उनका बदन कंपकंपा रहा था।
मैंने उनकी जींस का बटन खोला, नीचे सरकाया – पैंटी भी नहीं! उनकी चूत पहले से गीली, क्लीन शेव्ड, जैसे तैयार होकर आई हों।
दीदी बोलीं, "आज पूरी रात तेरी हूं, बस में ही चोद ले जितना मन करे। कोई रोकने वाला नहीं।" उन्होंने मेरी पैंट उतारी, लंड बाहर निकाला – वो पहले से तन चुका था।
दीदी हाथ से सहलाने लगीं, ऊपर-नीचे करती हुईं, जैसे कोई खिलौना हो। फिर वो मेरे ऊपर चढ़ गईं, काउगर्ल स्टाइल में।
चूत पर लंड रगड़ा, और धीरे से अंदर ले लिया। "उफ्फ...
कितना बड़ा है तेरा... भर देता है पूरी...
आह।" वो ऊपर-नीचे होने लगीं, बस की स्पीड से हर जंप में लंड गहरा जाता। उनके बूब्स मेरे चेहरे पर उछल रहे थे, मैं पकड़कर दबाता, चूसता।
दीदी की आंखें बंद, मुंह से निकल रहा था, "चोद मुझे... तेरी दीदी को रंडी बना ले...
रातभर पेल... बस के ये झटके और तेरा लंड, वाह...
मजा आ रहा है।" मैं उनकी कमर पकड़कर नीचे से धक्के मार रहा था, हमारा पसीना मिल रहा था। 12 मिनट की ये राइड इतनी इंटेंस थी कि दीदी झड़ गईं, उनका पानी लंड पर बहा, लेकिन मैंने नहीं रुका।
मैंने उन्हें नीचे लिटाया, पैर फैलाए, और मिशनरी में घुस गया। बस ब्रेक लगाती, टर्न लेती, हर मूवमेंट में लंड स्लिप होता लेकिन गहरा धंसता।
दीदी की गांड उठाकर मैं ठोक रहा था, उनके नाखून मेरी पीठ खरोंच रहे थे। "और जोर से...
फाड़ दे मेरी चूत... मैं तेरी गुलाम हूं आज...
चोद ले जितना मन करे।" 18 मिनट बाद मैं झड़ने वाला था, दीदी बोलीं, "अंदर मत, मुंह में दे... पी लूंगी तेरा रस।" मैंने निकाला, उनके मुंह में डाला, और पूरा स्पर्म निगल गईं।
वो मुस्कुराईं, "स्वादिष्ट है... तेरे जैसा।"
कुछ देर हम लेटे रहे, बस पहाड़ी रोड पर पहुंच चुकी थी, टेढ़े-मेढ़े रास्ते।
दीदी फिर से गर्म हो गईं, उनका हाथ मेरे लंड पर। "अब कुछ नया ट्राई करें?
डॉगी, बस के टर्न्स में मजा आएगा।" वो घुटनों पर हो गईं, गांड ऊपर की। मैंने पीछे से चूत में डाला, और पेलना शुरू।
एक हाथ से उनके बाल पकड़े, जैसे घोड़ी की लगाम, दूसरा हाथ गांड पर थप्पड़ मारता। थप्पड़ की आवाज बस की गूंज में खो जाती।
दीदी की गांड लाल हो गई, वो कराह रही थीं, "मार जोर से... चोद...
मेरी गांड को सजा दे... चूत तो तेरी हो चुकी है।" बस टर्न लेती, हमारा बैलेंस डगमगाता, लेकिन वो रोमांच और बढ़ाता।
दीदी की चूत टाइट हो गई, वो फिर से झड़ीं, उनका बदन कांप उठा। लेकिन मेरा नहीं हुआ।
दीदी पलटीं, बोलीं, "अब गांड में ट्राई कर? धीरे से, पहली बार है मेरे लिए।" मैं हैरान, लेकिन उत्साहित।
मैंने लंड पर थूक लगाया, उनकी गांड के छेद पर रगड़ा। धीरे-धीरे दबाया, आधा अंदर गया।
दीदी दर्द से चीखीं, "उफ्फ... फट रही है...
लेकिन मत रुक... चोद ले।" मैं धक्के मारने लगा, टाइटनेस कमाल की थी।
दीदी की आंखों में आंसू, लेकिन वो मुस्कुरा रही थीं, "और गहरा... गांड भी तेरी...
पूरी रात तेरी हूं मैं।" 12 मिनट की ये गांड चुदाई के बाद मैंने अंदर ही स्पर्म गिरा दिया। दीदी थककर लेट गईं, लेकिन खुश।
रात गहराती गई, बस रुकती स्टॉप पर, हम चुप हो जाते, परदा बंद। फिर शुरू – कभी 69 में, मैं नीचे उनकी चूत चाटता, जीभ अंदर-बाहर, दीदी ऊपर मेरा लंड चूसतीं, बॉल्स तक जीभ फेरतीं।
दीदी बोलीं, "तेरा लंड मेरे मुंह का फेवरिट है... चूस-चूसकर साफ कर दूंगी।" एक राउंड में दीदी ने मुझे बर्थ पर लिटाया और रिवर्स काउगर्ल में चढ़ीं, गांड मेरी तरफ।
मैं उनकी गांड दबाता, उंगली डालता। दीदी कूदती रहीं, "उंगली मत निकाल...
चूत और गांड दोनों भर दे।" वो दो बार झड़ीं, मैंने उनके बूब्स पर स्पर्म गिराया। पूरी रात 5-6 राउंड चले, हर बार नया पोज, नई गालियां, नया मजा।
सुबह 6 बजे बस हिल स्टेशन पहुंची, हम थके लेकिन संतुष्ट। दीदी ने हग किया, "तू मेरा बेस्ट पार्टनर है...
ऐसी ट्रिप फिर करेंगे।"
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Kartik
कहानीकार
